इस से पहले कि महाशय ग्रोक या श्रीमान चैट जी पी टी अंग्रेजी में नीचे पोस्ट किये हुए मेरे इस आलेख की टांग तोड़ कर हिंदी में परोसें मैंने इसी आशय का हिंदी में भी एक पोस्ट डाल दिया।
नीतीश कुमार जी का सुशासन: एक आकलन मनोज नाथ
“He would fall. He had not yet fallen but he would fall silently, in an instant: … falling, falling but not yet fallen, still unfallen but about to fall.” — James Joyce: A Portrait of the Artist as a Young Man
नीतीश कुमार जी आखिरकार मुख्यमंत्री से निवर्तमान मुख्यमंत्री हो गए। लंबे समय से चल रहा राजनीतिक स्वांग, जिसने सरकार को लगभग ठप कर दिया था, का पटाक्षेप हो गया। हम आभारी हैं कि यह सर्कस खत्म हो गया। बिहार की जनता अब मनोरंजन के लिए कोई दूसरा मुकाम ढूंढेगी।
राजनीति में सत्ता में बने रहना ही अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। इस मामले में नीतीश कुमार जी का रिकॉर्ड अप्रतिम है। उनका दल ज्यादातर समय गठबंधन सरकार में कनिष्ठ सहयोगी रहा है, फिर भी सरकार में उनकी हनक बरकरार रही। उन्होंने एकाधिपति शासक की तरह राज किया। उनके सहयोगी हरदम उनकी इच्छा के मुहताज रहे। अपने पहले कार्यकाल के बाद ही, उनकी सरकार के गिरने की खबर रोजाना राजनीतिक गपशप को रोचक बनाती रही। लेकिन नीतीश कुमार जी की सरकार कभी गिरी नहीं।
जब भी सहयोगी दल से उन्हें ऐसा अंदेशा हुआ, उन्होंने सत्ता हाथ से फिसलने से पहले ही आसन्न खतरे को भांपते हुए अपने वर्तमान सहयोगी से किनारा कर लिया और विपक्ष की पार्टी से हाथ मिला लिया। बिलकुल निर्विकार भाव से वे अपनी जादू की पोटली से अच्छा और बुरा वाला लेबल निकालकर — आरजेडी और भाजपा पर — परिस्थितियों के अनुसार चस्पा कर देते। विपक्ष का क्रिय कलाप कमो बेश गठबंधन रूपी छींका टूटने की आस में कि कब उनका तत्समय सहयोगी से गठजोड़ टूटे और वे उनके साथ गांठ जोड़ कर सत्ता का आस्वादन कर सके , तक सीमित रह ता था । वे विलक्षण प्रतिभा के धनी, सिद्धहस्त रणनीतिकार और कुशल नीतिकार हैं। उनकी राजनीतिक बाजीगरी तो बेमिसाल है।
चुनाव जीतना आज एक तरह से नैतिकता का पैमाना बन गया है। नीतीश कुमार जी ने खुद और अपने सबसे लंबे राजनीतिक सहयोगी के लिए चुनाव जीतने की अद्भुत क्षमता दिखाई है। इस अर्थ में वे खुद को नैतिक रूप से देश के सर्वश्रेष्ठ राजनेता कह सकते हैं। बिहार की जनता के सामने भी उनकी राजनीतिक दलबदली कभी भी राजनीतिक नैतिकता का सवाल बनकर नहीं उभरी। पार्टियों के बीच उनकी मौसमी यात्राएं और नियमित राजनीतिक विश्वासघात ने ‘आया राम गया राम’ की राजनीति को पुनर्जीवित ही नहीं किया, बल्कि प्रतिष्ठित भी कर दिया, जो एंटी-डिफेक्शन कानून के बाद कुछ समय के लिए विलुप्त हो गई थी। और तो और, उन्होंने इसे एक दार्शनिक जामा भी पहना दिया। सही मायने में वे तथागत (तथा + आगत: इस प्रकार आए; तथा + गत: इस प्रकार गए) हो गए। उनका आना-जाना मात्र माया की एक मोहक भंगिमा थी। वे हमेशा वहीं थे — सदा सर्वदा के लिए — निस्वार्थ भाव से, बिहार के भले के लिए। उनकी प्रसिद्ध उक्ति “आप तो जनबे करते हैं, हम दिन-रात बिहार के लिए काम करते हैं” ने ज्यादातर बिहारियों को सहमति में सिर हिलाते पाया।
श्री नीतीश कुमार जी ने आखिरकार सत्ता का परित्याग कर दिया। लेकिन अपनी शर्तों पर। उनके सार्वजनिक जीवन में असंगत, अटपटा और कभी-कभी आपत्तिजनक व्यवहार उनके दरबारियों और रणनीतिकारों के लिए उत्तरोत्तर परेशानी का सबब बन रहा था। अपनी सावधानी से गढ़ी गई छवि के अनुरूप, उन्होंने इस अनिवार्यता को भी बिहार के हित में त्याग का रूप दिया। लेकिन शह-मात के सर्वोत्तम खिलाड़ी ने विदा होने से पहले भाजपा को दिखा दिया कि गेम ऑफ थ्रोन्स में उनकी कोई प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता। रियलपॉलिटिक के नायाब नमूने के रूप में उन्होंने भाजपा की ही पार्टी से अपने पसंदीदा व्यक्ति को मुख्यमंत्री स्थापित कर दिया, जिससे भाजपा नेतृत्व, जिसकी कदाचित कोई प्रच्छन्न योजना थी, स्तब्ध और निरुत्तर रह गया। गेम, सेट एंड मैच, नीतीश कुमार जी।
निशांत उनके पुत्र हैं, परंतु संयोजकों ने यह सुनिश्चित किया कि राजनीति में उन्हें लॉन्च करने में वंशवाद की कोई भी बू न हो। यह महज एक संयोग है कि उन्होंने अभी कोई जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया। राजनीतिक अखाड़े के पहलवान बताते हैं कि यह भी किसी दूरगामी योजना का हिस्सा है।
उन्होंने जंगल राज के बाद बिहार को कैसे सुशासन दिया ।बिहार का उन्होंने कैसे कायाकल्प कर दिया, कैसे बिहार आज खुशहाल और विकसित हो गया है। उनकी स्तुति में राजनीतिक विश्लेषकों, मीडिया कर्मियों और शिक्षाविदों के कई पोस्ट देख सकते हैं। वे सभी सम्माननीय और बुद्धिमान लोग हैं।
यकीन बिहार रोड, पुल, फ्लाईओवर, भवन जैसी बुनियादी सुविधाओं का विस्तार हुआ है, बिजली मुहैय्या करने में भी आशातीत सुधार हुआ है। साथ ही भव्य भवनों, म्यूज़ियम, मोनुमेंट्स, मेडिटेशन सेंटर, कन्वेंशन सेंटर तो हर नुक्कड़ चौराहे से विकास की कहानी विज्ञापित कर रहा है। नीतीश कुमार जी के जीवनीकारों ने उनके राजनीतिक करियर में केवल उनके सबसे अच्छे और सबसे सफल कार्यों को समाविष्ट किया गया है। अखबारों ने वास्तविकता को तो इतना सजाया कि उसी कालखंड में जी रहे और सरकार को करीब से देख रहे लोगों को भी भ्रम होने लगता है।इससे दीगर कहानियां भी हैं।
मसलन दो दशक से ज्यादा के लगातार सुशासन के बाद भी बढ़ता बिहार, विकसित बिहार आज कहाँ खड़ा है? ज्यादातर विकास संबंधी सूचकों में बिहार सबसे नीचे है। भले ही सरपट रफ्तार से विकास हुआ हो, लेकिन बिहार की जनसंख्या का 26 प्रतिशत — कुछ अन्य कहते हैं और ज्यादा — गरीबी रेखा से नीचे है, जो देश में सबसे ज्यादा है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा या स्वास्थ्य सेवाओं के अवसर न के बराबर हो गए हैं, बेरोजगारी हमारे जीवन का अनिवार्य तथ्य है, बिहारी शब्द ही माइग्रेंट लेबर का पर्याय बन गया है। Through the Looking-Glass, and What Alice Found There में रेड क्वीन एलिस कहती है: “Now, here, you see, it takes all the running you can do, to keep in the same place.” “बस उसी जगह पर बने रहने के लिए तुम्हें निरंतर दौड़ते रहना होगा।”
जनता का नैतिक उत्थान मसीहाई नेताओं की निजी जिम्मेदारी बन जाती है। भारत में शराबबंदी लागू कर देना गांधीवादी होने का सबसे पुख्ता प्रमाण है। शराबबंदी नीतीश कुमार जी के कार्यकाल का सबसे महत्त्वपूर्ण एजेंडा था, जिसे प्रभावी रूप से लागू करने के लिए उन्होंने पूरी ताकत झोंक दी। वे इसे कामयाब बनाने के लिए प्रतिबद्ध थे, भले ही कितनी भी कीमत चुकानी पड़े। बिहारियों ने इसका प्रतिकार भी महात्मा गांधी के द्वारा बताए गए अस्त्र — सविनय अवज्ञा आंदोलन — से किया। यह जानकारी आम है कि कानून की धज्जियां उड़ाते हुए सबसे निचले पायदान पर खड़ा आदमी और समाज का अभिजात वर्ग दोनों — मंत्री, सबसे वरिष्ठ सिविल सर्वेंट और पुलिस अधिकारी — शराब पीते हैं। युवा लड़के और लड़कियों की एक फौज अब घर-घर कंट्राबैंड शराब पहुंचाने लगी है, जो अब लगभग ओवरग्राउंड गतिविधि बन गई है। कथित तौर पर एक आरक्षी महानिरीक्षक और उनके अधीनस्थ एक आरक्षी अधीक्षक में शराबबंदी लागू करने जैसे कठिन कार्य से होने वाले फायदे-नुकसान को लेकर आपस में ठन गई। शायद वे समझदार थे; क्योंकि पुलिस पदाधिकारी जो कोटा पूरा करने के लिए छापेमारी करते हैं, वे अक्सर पिट जाते हैं, कभी-कभी गोली भी झेलनी पड़ती है। लेकिन बिहारियों में कॉमिक टाइमिंग की कमी नहीं होती: मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अवैध शराब बनाने वालों पर हवाई निगरानी के लिए खरीदा गया ड्रोन को गिरोहों ने इसे अपनी निजता का अतिक्रमण मान कर ड्रोन को ही हाईजैक कर लिया। शराबबंदी जब शराब खुलेआम उपलब्ध थी, उससे ज्यादा बिहारियों की मृत्यु अब अवैध मदिरा पीने से हो रही है। नैतिक पुनरुत्थान का सीधा उल्टा असर हुआ है और बिहार निरंतर अनैतिकता के अंधेरे कुएं में डूबता चला जा रहा है। महात्मा गांधी बनाम महात्मा गांधी की जंग ने बिहार की कमर तोड़ दी है। राज्य की वित्तीय सेहत चिंताजनक है, जबरदस्त नए माफिया गिरोह खड़े हो गए हैं, और नए नशेड़ियों को ड्रग्स और अपराध की ओर धकेल दिया है। जेलें भरी पड़ी हैं और शायद पहली बार, न्यायिक अधिकारी शिकायत कर रहे हैं कि उनके पास शराबबंदी से जुड़ी जमानत याचिकाओं के अलावा सुनने के लिए कुछ नहीं बचा है। लेकिन सरकार को अपने निर्णयों के सही होने पर अटूट विश्वास है।
भ्रष्टाचार का साम्राज्य है। राजस्व प्रशासन — जिसका जनता से सबसे ज्यादा संपर्क है — इसका प्रतीक बन गया है: स्पीड मनी दो या दूर रहो। सरकार जानती है, और बहुत अच्छी तरह जानती है, लेकिन इसे काबू में करने में खुद को असहाय पाती है। हर टकराव में सरकार ही उनके ब्लैकमेल के आगे झुक जाती है और रियायतें दे देती है। आज जब मैं यह लिख रहा हूँ, वे हड़ताल पर हैं। सड़कें, पुल, इमारतें उद्घाटन से पहले ही ढह जाती हैं, और गिरते पुलों ने लोकप्रिय चर्चा में डार्क ह्यूमर को जन्म दे दिया है। संक्षेप में, हर उपलब्ध संकेतक घोर कुप्रबंधन की ओर इशारा करता है। बिहार नैतिक पतन और सामाजिक अराजकता की स्थिति में है। फिर भी, सुशासन नामक अंधविश्वास जीवित है।
नीतीश कुमार जी को साधारण राजनेताओं से अलग करने वाली बात उनकी जनमत प्रबंधन की अतुलनीय क्षमता है। उनकी छवि बेदाग है — जैसे किसी तटीय स्मारक पर कोई दाग या कीचड़ नैसर्गिक तत्त्वों (हवा या समुद्र की लहरों) के चलते ठहर नहीं पाता, उसी तरह समय-समय पर उठे सारे स्कैंडल और विवाद सार्वजनिक स्मृति से प्राकृतिक रूप से धुल जाते हैं। राजनीतिक अवसरवाद और किसी भी कीमत पर सत्ता से चिपके रहने के प्रयास के बावजूद, नीतीश कुमार जी का नैतिक हाई ग्राउंड पर अभी भी दावा बरकरार है। मीडिया का एक बड़ा हिस्सा कुछ समय पहले तक उन्हें देश पर शासन करने का विश्वसनीय विकल्प बताकर आगे बढ़ाता रहा। अब वे राज्यसभा टिकट पर दिल्ली के लिए कूच कर चुके हैं, पर पीछे एक विरासत भी छोड़ जा रहे हैं: खाली खजाना और पूरी तरह लचर व्यवस्था, जिसे सुधार पाना आसान नहीं होगा।