मंत्रीजी हाल में हुई पुल गिरने की घटनाओं को लेकर जनता दरबार में हाज़िर थे । पत्रकार भी बड़ी संख्या में आये थे।
पत्रकार " कल पुल टूटकर नीचे नदी में गिर गया। यह तो सबसे ताज़ी घटना है। अभी तक इसी महीने में एक सौ बावन पुल टूटकर नीचे नदी में गिर चुके हैं। इस बाबत सरकार को क्या कहना है ?"
मंत्री जी उनके चेहरे पर नज़र टिका दी और बहुत संजीदगी के साथ बोलना शुरू किया:
"सरकार में मंत्री बने रहने के लिए असाधारण धैर्य की आवश्यकता होती है। एक पुल टूटकर नदी में नीचे गिर गया। अब आप चाहते हैं कि मैं यह समझाऊँ कि वह नीचे क्यों गिरा । हालांकि किसी निरक्षर भट्टाचार्यको भी ये बताने की ज़रुरत नहीं कि जो भी चीज़ गिरती है, वह नीचे ही गिरती है।यह न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत है और आज तक इसका कोई अपवाद नहीं मिला है। वैसे कभी आपने ऐसा कोई पुल देखा है जो टूटने के बाद नीचे गिरने के बजाय हवा में लटका कर रह गया हो, या फिर नीचे जाने के बदले ऊर्ध्वगामी हो गया हो?
अमेरिका से अधिक विकसित देश तो कोई नहीं है । वहाँ भी अटलांटा में एक पुल टूटा और नीचे गिर गया, और उसके साथ मोटर चालक भी नीचे चले गए।
लेकिन मैं एक लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित सरकार का मंत्री हूँ। मैं प्रेस की स्वतंत्रता का सम्मान करता हूँ। सरकार से निरर्थक, हास्यास्पद या अनर्गल प्रश्न पूछना आपका पूर्ण अधिकार है। यह प्रश्न पूछकर आपने केवल एक बार फिर पूरी दुनिया के सामने प्रेस की स्वतंत्रता के प्रति हमारी अटूट प्रतिबद्धता को प्रमाणित किया है।"
सम्यक उत्तर देकर वे निश्चिंत हो गए।
पर वो पत्रकार कहाँ मानने वाले थे। उन्होंने फिर यही प्रश्न दुहराया। मंत्री जी ने फिर वही उत्तर दिया पर इस बार थोड़े कुपित हो गए ।
"मुझे पूरा विश्वास है, स्कूल में आपको ज़रूर पढ़ाया गया होगा। हमारी शिक्षा-व्यवस्था इतनी भी लचर नहीं है। जब मास्टर जी ने यह सिद्धांत पढ़ाया, तो बताइए आप कहाँ थे? मेरा दावा है कि आप गुटखा खाकर बाहर थूकने गए होंगे। है न?"
इस बार पत्रकार हत्थे से उखड़ गए और गुस्से में हकलाने लगे। पर मंत्री जी ने बहुत संयत स्वर में कहा-
मंत्री :"आपके प्रश्न का मैंने संजीदगी और साफ़गोई से उत्तर दिया।सरकार को भी तो यह जानने का हक़ है कि वह शिक्षा के मद में इतनी राशि व्यय कर रही है तो उसका नतीजा क्या निकल रहा है ?"
पत्रकार "देखिए, यह पुल दो महीने पहले बना था, पाँच सौ करोड़ की लागत से और..."
"आप विषयांतर कर रहे हैं। आपने कैफ़ियत माँगी थी कि पुल टूटकर नीचे क्यों गिर गया।फिर कह रहे हैं कि दो महीने में क्यों गिर गया। तो सरकार का सुविचारित मन्तव्य है कि यदि यह पुल दो सौ साल बाद भी टूटता तो नीचे ही गिरता। उसकी और कोई गति नहीं थी। एक्सपर्ट जाँच से यह प्रमाणित हुआ है कि पुल को नीचे गिराने के लिए ग्रेविटी जिम्मेदार है गवर्नमेंट नहीं। सरकार गम्भीरता से इस विन्दु पर विचार कर एक जाँच कमेटी बिठाएगी, जो अतिशीघ्र अपना मन्तव्य देगी कि आपकी इस अज्ञानता के लिए आपको पढ़ाने वाला शिक्षक दोषी है या आपका भगोड़ा पन।
पुलिस प्रमुख की ओर देखते हुए उन्होंने कहा, "खुफिया विभाग से इनकी कार्य कलाप के जाँच करवा लीजिए, कहीं ये एनिमी एजेंट तो नहीं हैं ।और इनसे दस हज़ार का बॉन्ड भरवा लीजिए कि जाँच की अवधि तक ये अपना घर छोड़कर बाहर नहीं जाएँगे।"
पत्रकार घिघियाते हुए "सर, मेरी बात तो..."
"सिक्योरिटी! इनको धक्के देकर बाहर करो।"
प्रेसवाले अब थोड़े ठंढे पद गए।
प्रेस :"श्रीमान, आपको तो मालूम होगा कि अमुक चीफ़ इंजीनियर को आपके ही निगरानी विभाग ने पुल निर्माण में हुए घपले में पकड़ा है। उन पर दो सौ करोड़ की बेईमानी का आरोप लगा है। वे मंत्री जी के सगे साले हैं।पर ऐसी ख़बर है कि मंत्री जी के साले के ख़िलाफ़ इन्क्वायरी के चलते उस विजिलेंस अफ़सर को ही मुख्यालय बुला लिया गया।"
मंत्री :"इस ख़बर का क्या आधार है?"
प्रेस "यदि ग़लत है तो तत्काल उसका खंडन कर दीजिए।"
मंत्री "जी नहीं, यह ख़बर सौ प्रतिशत सही है कि चीफ़ इंजीनियर पर आरोप लगा है कि उन्होंने दो सौ करोड़ का घपला किया है। यह भी सही है कि वे मंत्री जी के-यानि मेरे-सगे साले हैं। मुझे मंत्री पद मिलने के बाद उनकी डिज़ाइन शाखा से बदलकर वर्क सेक्शन में नियुक्ति हुई।
प्रेस :तो फिर
तो फिर क्या ?
आपने स्कूल में साइंस पढ़ा है?"
प्रेस "इससे आपको क्या मतलब? फिर न्यूटन का सिद्धांत लगेगा क्या?"
मंत्री "पहले बताइए तो सही।"
बहुत तल्ख़ी से उन्होंने कहा, "हाँ, तो?"
"तब क्या? न्यूटन का फ़र्स्ट लॉ क्या है?"
"आपने क्या मज़ाक बना रखा है?"
"आप भूल गए हैं। चलिए मैं बता देता हूँ। स्थिर वस्तु स्थिर ही रहती है और गतिशील वस्तु गतिशील ही रहती है, जब तक उस पर कोई असंतुलित बाहरी बल कार्य न करे।
उदाहरण के लिए, जब आप ट्रेन में होते हैं और ट्रेन अचानक चल पड़ती है तो आपका संतुलन बिगड़ जाता है, क्योंकि आपके शरीर का ऊपरी हिस्सा अभी भी स्थिर रहता है, जबकि निचला हिस्सा गति में आ जाता है। अब देखिये इतने दिन से डिज़ाइन में इंजिनियर साहब की गाड़ी रुकी पड़ी थी। मैंने थोड़ा-सा पैरवी का धक्का दिया और उनकी तो चल पड़ी पर वे धड़ाम से गिर पड़े। दोनों हाँथ से बटोरते हुए उन्हें विजिलेंस ने उन्हें पकड़ लिया। विजिलेंस वाले अफ़सर को लाइन हाज़िर किया गया है क्यूंकि उन्होंने प्राकृतिक कारणों से होने वाली घटना के लिए एक ऑफिसर के खिलाफ करवाई कर उसका मनोबल तोड़ा । विजिलेंस अफसर की शैक्षणिक योग्यता जाँची जाएगी। ज़ाहिर है, न्यूटन के फ़र्स्ट लॉ की जिसे जानकारी नहीं है, उसकी डिग्री तो फ़र्ज़ी ही होगी।
'लेकिन, सर
"आपने जानना चाहा कि विजिलेंस वाले जाँच से क्यों हटाए गए। आपको जानकारी दे दी गई। आप दूसरों को मौक़ा दीजिए। हाँ, मैंने सरकार से आग्रह किया है कि हर पंचायत में न्यूटन के नियमों की पढ़ाई के लिए विशेष व्यवस्थ की जाए, ताकि पदाधिकारी इस तरह की गलतियों के शिकार न हों और आम जनता एवं भ्रष्टाचार निरोध दस्ते अज्ञानता के कारण सरकार एवं सरकारी पदाधिकारियों की निष्ठा पर संदेह न कर सके।"
पत्रकार इसके पहले कोई प्रतिवाद करता, उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखाया गया।
एक पत्रकार ने वृद्धावस्था पेंशन समय पर निर्गत न करने के लिए सरकार की जमकर मज़म्मत की।
"देखिए, उन्हें दो वर्षों से पेंशन नहीं मिला है।"
पत्रकार ने अपनी बात को बल देने के लिए हुए एक वयोवृद्ध सज्जन को आगे आने का इशारा किया।
उसे देखते ही मंत्री जी खड़े हो गए। नाटकीय अंदाज़ में चरण-स्पर्श की मुद्रा में बोले—
"आइए, आइए पितामह। लगता है आप शर-शय्या से सीधे उठकर चले आ रहे हैं। कदाचित सूर्य के उत्तरायण होने की प्रतीक्षा से बोर होकर।"
उन्होंने कुछ बोलना चाहा, लेकिन उन्हें मंत्री जी ने टोक दिया—
"आपकी उम्र कितनी है, पितामह? अस्सी तो हो ही गए होंगे?"
उन्होंने थोड़ा गर्व से कहा, "मैं पचासी का हूँ।"
"तो फिर सरकार को क्यों कोस रहे हैं? सरकारी बजट आँकड़ों पर बनता है। आँकड़े बताते हैं कि यहाँ हर व्यक्ति की औसत आयु चौंसठ साल है। आप पचासी की आयु में पहुँच गए हैं। सांख्यिकी के नियम को धता बताकर २१ साल से अनुचित पेंशन ले रहें है। कोई गैरत मंद आदमी तो शर्म से मर जाता। आप वृद्धावस्था पेंशन में देर के लिए व्याकुल हो रहे हैं।
पहले तो बाल-बच्चे वृद्ध लोगों को अक्सर गंगा-स्नान कराने ले जाते थे। वहाँ संयोग वश बहुधा उनका गंगा-लाभ हो जाता था। आपके बाल-बच्चे नहीं हैं क्या? सरकार ने तो घोषणा कर ही दी थी—
'हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था,
शौक़ से डूबे जिसे भी डूबना है।'(दुष्यंत कुमार )
मंत्री ने इतनी संजीदगी से यह परामर्श दिया कि पितामह शर्मिंदा होकर तुरत खिसक लिए। मंत्रीजी ने एक हरकारे को दौड़ाकर कहलाया कि बाहर रिसेप्शन पर बता देना कि अगर पितामह स्वेच्छा से चूहे मारने वाली दवा लेना चाहें तो उन्हें निःशुल्क सरकारी ख़र्च पर उपलब्ध करा दिया जाए.