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Thursday, July 30, 2026

इस बेतुकी, बेलगाम और कुछ-कुछ चिलम के नशे में धुत्त व्यंग्य-कथा का किसी व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है। जिसे अपनी प्रतिछवि देखे वह उनकी फैंटेसी होगी। हिन्दुओं के पुनरुद्धार का एजेंड


आज वो बहुत उत्तेजित थे। उनसे हिन्दुओं की दुर्दशा देखी नहीं जा रही थी। कभी-कभी उठकर बात बढ़ाते हुए टहलने लगते, कभी सोफे पर धम्म से बैठ जाते। जैसे-जैसे शाम ढल रही थी, उनके हिन्दुओं के पुनरुद्धार के एजेंडे के आइटम बढ़ते जा रहे थे। साथ ही साथ चिलम का कश भी लगाए जा रहे थे। उनकी व्यग्रता और बढ़ते हुए तनाव को देखकर मैं इधर-उधर की बात करके माहौल को थोड़ा हल्का बनाना चाह रहा था, लेकिन लगता था कि वे घर से क्रान्ति की तिथि निर्धारित करके चले थे। बार-बार मुझे समझा रहे थे कि सिलसिलेवार ढंग से इसे फलित करना है।
लेकिन एजेंडा नम्बर 1, सबसे पहले क्या करना है, उसे बिल्कुल कसकर पकड़े हुए थे। दम लगाके हईशा!
मैंने उन्हें मनाया कि एजेंडा नम्बर 2 से शुरू करते हैं। पर उन्होंने जो लकीर पकड़ ली, बस उसी के फ़कीर बने हुए थे।
उन्हें बहुत समझाया। मैंने सोचा कि गांजे का कश लगाते-लगाते थोड़े शिथिल होंगे तो उन्हें पायदान नम्बर एक से दो पर ले जाऊँगा। इतिहास का जो भी थोड़ा-बहुत ज्ञान है, उसी के आधार पर मैं उन्हें हर ढंग से समझा रहा था।
अपनी बात के आगे तो वे किसी की बात को रत्ती भर तरजीह नहीं देते। मैं अज्ञानी, +3.5 का रीडिंग ग्लास वाला चश्मा पहनने के बाद अपने व्हाट्सऐप मेसेज पढ़ पाता था। भूत, वर्तमान और भविष्य सब उनके सामने पसरा पड़ा था। इस त्रिकालदर्शी के सामने मैं अपने को बड़ा हीन महसूस कर रहा था। चिलम के कश पर कश लगाने के साथ चेतना के उत्तुंग शिखर पर पहुँचा हुआ वह मनीषी अब आत्मविश्वास से लबरेज़ था। उनकी आवाज़ में जो भी थोड़ी-बहुत शालीनता और लिहाज़ था, वह अब काफूर हो चुका था। उनकी नज़र में मैं बिल्कुल सठियाया हुआ बूढ़ा था।
अब उन्होंने अपनी शालीनता का चोला उतारना शुरू कर दिया। अनाहूत दी गयी अंकल की उपाधि वापस लौटायी और औपचारिकता की बंडी को बगल की खूंटी पर टाँगकर मर्यादा की धोती उतारनी शुरू कर दी।
“मिस्टर नाथ,” उन्होंने मुझे उद्बोधित करना शुरू किया।
मैंने श्रीहरि का मन-ही-मन स्मरण किया। मेरे हृदय में सतत वास करने वाले देवाधिदेव सदाशिव को साक्षी मानकर अंतिम बार उनसे इस मूर्खतापूर्ण योजना को मुल्तवी करने का आग्रह किया।
देखिए, मैं सचमुच सठिया गया हूँ। यह तो वही बात हुई कि सारी रामायण कह गए और सीता किसकी जोय!
बात यह है कि ये सज्जन हालाँकि जवानी की दहलीज़ पार कर चुके हैं, लेकिन इनका जवानी वाला जोश और जज़्बा बरकरार है। यूपीएससी की जंग अनेकों बार हारने के बाद इन्होंने हिन्दुओं के पुनरुद्धार का बीड़ा उठाया है। इनका मानना है कि अपने ही देश में हिन्दुओं की हेठी हो रही है। हिन्दुओं को उनका जायज़ हक़ मिलना चाहिए। बहुसंख्यक होते हुए भी उनकी कोई अहमियत नहीं, क्योंकि हिन्दू अपने अधिकारों और अपनी विरासत के प्रति सजग नहीं हैं।
इसके लिए सबसे पहले हिन्दुओं को जगाना है। हाथ में बड़े-बड़े प्लेकार्ड लेकर, झाल-मजीरे के साथ “जागो हिन्दू, जागो” का जागरण अभियान चलाना चाहते थे। हिन्दुओं को संगठित करना चाहते थे। तकरीरें देना चाहते थे, सड़क-चौराहों पर उद्बोधन करना चाहते थे, “जागो हिन्दू, जागो।”
यह आइडिया तो अच्छा था, लेकिन मैंने सिर्फ़ इतना कहा था कि इसे नम्बर 2 पर रखा जाए। पहले हमलोग कार्ययोजना तैयार कर लें कि जैसे ही वह जगे, उसे बिना आयोडेक्स मले काम पर लगा दिया जाए। अमुक किला तोड़ना है, अमुक दीवार ढहानी है, इत्यादि-इत्यादि।
मैंने कहा, हिन्दू का जागना खतरनाक हो सकता है। कम से कम पन्द्रह सौ साल से सोया हुआ हिन्दू उठेगा तो बहुत से सवाल करेगा। सवाल का मतलब बवाल। अब जैसे वह पूछने लगेगा, मेरा इतिहास कहाँ खो गया? मैं तो यह था, वह था। इस तर्ज पर:
“पैरों पर ही है पड़ी हुई मिथिला भिखारिणी सुकुमारी,
तू पूछ कहाँ इसने खोई अपनी अनन्त निधियाँ सारी।”
या अपनी शक्तिहीनता देखकर यह पूछ बैठे:
“ओ मगध! कहाँ मेरे अशोक, वह चन्द्रगुप्त बलधाम कहाँ?”
या यही पूछ बैठे कि चलो इतिहास तो इतिहास, मेरे भूगोल पर किसने और कब सेंध मार दी? जम्बूद्वीप की सीमाएँ कब और कैसे बदल गईं? उसके पास अपनी सांस्कृतिक विरासत और समृद्धि को लेकर भी ढेर सारे सवाल हैं। या यही पूछे कि गैरों ने लूटा तो लूटा, अपनों ने हमारे मन्दिरों को क्यों लूटा?
भैय्या, सोने दो। हिन्दू सोते हुए अच्छा लगता है। इतिहास में हर बार लुटता है, पिटता है, फिर सो जाता है, जब तक दूसरा आकर लूटे या पीटे नहीं। कम से कम बचा तो है। हर पाँच साल में उसे उठाते हैं न, “हिन्दू धर्म ख़तरे में है” कहकर उसका वोट लेते हैं। उनींदी आँखों से कितनी सहजता से वह वोट दे देता है। काम हो जाता है। फोकट में झमेला मत लो। मत जगाओ उसे।
कुम्भकर्ण भी साल में एक बार उठता था। इमरजेंसी में रावण ने उठाया, काल-कवलित हो गया।
पर वह कहाँ मानने वाला था। उसकी लाल आँखें उसके सिर पर लगे लाल टीके से मैच करने लगीं। उसने झकझोरकर हिन्दू को जगाने की कोशिश की। ज़ोर-ज़ोर से झाल बजाया, माइक पर गाने बजवाए। अन्ततः हिन्दू उठ ही गया और बड़े तल्ख़ लहजे में उसने कहा:
“यह हिन्दू अब जग गया। बताओ, क्या करना है?”
बहुत संक्षेप में उसने आसन्न ख़तरे की चर्चा की और कहा कि जब तक हम लोग एकजुट नहीं होते, हम लोगों का सम्पूर्ण क्षय निश्चित है।
अभी यह हिन्दू सोच ही रहा था कि अचानक एक प्रतिच्छवि-सी अवतरित हुई और उसने ज़ोर से कहा:
“अबे, ये साला अमुक जाती का यही तो हिन्दू धर्म के पतन का कारण है।”
तब तक कई अन्य प्रतिच्छवियाँ अवतरित हो गईं और भयंकर विवाद-सा छिड़ गया। यह विवाद धीरे-धीरे युद्ध में परिवर्तित होने लगा। यूँ कहें तो एक महाभारत ही छिड़ गया। लेकिन यह दूसरा ही महाभारत था।
कल तक पाँचों पाण्डव एक साथ लड़ते थे। देखा तो लगा, भीम ने अलग सेना खड़ी कर ली है। श्रीकृष्ण, जो द्वापर में अर्जुन का रथ हाँकते थे और जिन्होंने पाण्डवों को जीत दिलायी थी, अनुपस्थित थे।
अभी पाञ्चजन्य काशंखनाद भी नहीं हुआ था किसी ने मनुस्मृत्यास्त्र का संधान किया। बदले में मण्डलास्त्र का प्रयोग हो गया। अम्बेडकरास्त्र, रोहित वेमुलास्त्र और शम्बूकास्त्र जैसे भाँति-भाँति के आयुधों का प्रयोग निर्बाध रूप से होने लगा। भयानक रक्तपात होने लगा। रक्तरंजित, भूमिलुण्ठित हिन्दू फिर भी कहाँ मानने वाला था।
इधर गुप्तचरों ने एक अविश्वसनीय-सी सूचना दी,श्रीकृष्ण ने जरासन्ध से बातचीत शुरू कर दी थी और शीघ्र ही एक अलग दल की घोषणा होने वाली थी जिसे सुनते ही अर्जुन ने अपना गांडीव रख दिया।
उधर धृतराष्ट्र अधीर होकर संजय से पूछ रहे थे:
“धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय॥”
संजय ने यह दृश्य देखा तो स्वयं अपनी आँखें फोड़ लीं।
“महाराज, मैं भी अन्धा हो गया हूँ।”